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प्रस्तुत बा 'आखर ई पत्रिका' के संयुक्तांक ( जुलाई 2016 + अगस्त 2016 ) यानि कि आखर ई पत्रिका के जुलाई-2016 ( 17वाँ ) आ अगस्त-2016 (18वाँ ) अंक के संयुक्त रुप से प्रस्तुति ।

 

'बेबस बनारसी ' जी के लिखल निर्गुण के कुछ पंक्ति ह -

चमकत सुरुजवा अकसवै में बुड़िहैं , बुड़ि जइहैँ दुइजी कs चान हो,
रैन अन्हियरिया डगरिया भुलाई , भूलि जइहैँ गरब-गुमान हो ।
एक तs पथिक अनजान डगर कै, दूजे नs बुद्धि गियान हो -
तीजे नs प्रीतम कै रंग-ढंग जानल , कइसे कs होई मिलान हो ।

निर्गुण जवन भोजपुरी गीत संगीत के जान त हइये ह , भोजपुरिया क्षेत्र के रोज के दिनचर्या के शुरुवात के साथियो ह । आखर टीम खाति हर अंक एगो नया दिन आ हर अंक के प्रस्तुति फजीर के शुरुवात ह । आखर टीम एह बात के जानत बिआ कि कुछउ अजर अमर नइखे बाकि टीम के प्रयास बा लगन से लागल । आखर ई पत्रिका मे देरी आ फेरु संयुक्तांक के निर्णय लिहल गइल त आखर टीम के ध्यान मे ई बात रहे कि जुलाई अंक खातिर दिहल विषय " भोजपुरिया खान-पान के संस्कृति आ साहित्य " के संगे संगे अगस्त अंक खातिर सावन , कजरी , रोपनी , रक्षाबंधन जइसन विषय रहे के चांही । त संयुक्तांक जुलाई -अगस्त महीना के हर रुप हर रंग हर भाव के ले के आ रहल बा ।

डा. परमेश्वर शाहाबादी जी सावन आ पिया प श्रृन्गार मे लिखले बानी कि -

सावन घिरल आकाश बदरिया ,
झर-झर बरिसल मेघ बदरिया ,
रितुरानी के आंख गील बा
बहि - बहि कहत बतास ,
हिया मे पिया मिलन के आस ।

एगो पत्रिका खाति ओकर पाठक सबकुछ होले आ आखर टीम आखर पत्रिका के ले के ठीक ओइसहीँ गम्भीर बिआ । संयुक्तांक के प्रस्तुति खातिर आखर टीम लगातार मेहनत कइलस हs संगे संगे आखर के तकनिकी टीम एह जेंउवाँ / जुड़वा ( संयुक्त ) अंक के संगे " आखर वेबसाईट " के फेरु से शुरु कइ रहल बिआ । यानि कि अब रउवा सभ के आखर ई पत्रिका के मय अंक आखर के वेबसाईट प मिली जवन पहिले हैक हो गइल रहे ।

त आखर के एह अंक यानि कि " संयुक्तांक " जवना मे रउवा सभ खातिर संग्रह करे जोग लेख पढे के मिली , संगे संगे भोजपुरिया खान-पान के संस्कृति से , भोजपुरी साहित्य से , भोजपुरी के कर्मप्रधान रुप से , संगीत गीत लोकगीत से , गंवई कथा कहानी से परिचयो होइ । कैथी मे आपन बात से शुरु होखे वाली आखर ई पत्रिका , बतकूचन के नेव प आगे परी बढी जवना मे भोजपुरिया जवार मे खान-पान के जवन संस्कृति बा , परम्परा बा ओह प बड़हन आ गोटगर लेख के संगे आगे परि बढत , भोजपुरिया समाज के लोकगीत , किस्सा- कहनी , पर्व त्योहार के संगे आगे परी बढत , विजय दिवस के अपना मे समेटले , संस्मरण , बतकही , कविता गीत के रस मे बुड़त , रक्षाबंधन के बंधन मे अपना के बान्हत , समाज मे फइलल जरत मुद्दन प अपना तरिका से बात राखत , बाल कहानी के अंगुरी धइ के चलत लउकी ।

जइसे कि पिछला कुछ अंक से भोजपुरी किताबिन से परिचय हो रहल बा ओहि क्रम एहू अंक मे कुछ नया किताबिन के बारे मे जाने के मिली । भोजपुरी मे पद्य के उपर विवेचनात्मक चिंतन पढे के मिली । आजादी के रंग मे बु‌डत , कैरियर आ शिक्षा के संगे संगे आखर ई पत्रिका के " संयुक्तांक " अपना भाषा भोजपुरी खाति चित्रकथा के माध्यम से पुरजोर आवाजो उठाई ।

त अपना हर कमी , भइल देरी खातिर रउवा सभ से क्षमा मांगत , आखर के इ संयुक्तांक रउवा सभ के हवाले करत बानी जा ।